LIVE Course for free

Rated by 1 million+ students
Get app now
0 votes
181 views
in Sociology by (55.9k points)
closed by

चार्ल्स कूले ने प्राथमिक समूहों के कौन-कौन से तीन उदाहरण दिए हैं? इन समूहों को प्राथमिक समूह क्यों कहा जाता है?

या

प्राथमिक समूह की परिभाषा दीजिए। समाज में प्राथमिक समूह के महत्व को कैसे समझा जा सकता है?

2 Answers

+1 vote
by (57.8k points)
selected by
 
Best answer

सामाजिक समूहों के जितने भी वर्गीकरण विद्वानों ने किए हैं, उनमें प्राथमिक और द्वितीयक समूह के वर्गीकरण को विशेष महत्त्व दिया जाता है, जिसका आधार सामाजिक संबंधों की प्रकृति है। इस वर्गीकरण के प्रतिपादक अमेरिकी समाजशास्त्री चार्ल्स हार्टन कूले (Charles Horton Cooley) हैं। उन्होंने 1909 ई० में अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘सोशल ऑर्गनाइजेशन’ (Social Organization) में इसका विस्तार से उल्लेख किया है। प्राथमिक समूह के सदस्यों की संख्या सीमित होती है तथा उनके आपसी संबंध अधिक घनिष्ठ होते हैं। इसके विपरीत, द्वितीयक समूह के सदस्यों की संख्या अधिक होती है, परंतु उनके आपसी संबंध अधिक घनिष्ठ नहीं हो पाते।

प्राथमिक समूह का अर्थ एवं परिभाषाएँ

प्राथमिक समूह वे समूह हैं, जिनमें लघु आकार के कारण व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे से भली प्रकार परिचित होते हैं। अन्य शब्दों में, जिसे समूह में प्राथमिक संबंध पाएँ जाते हैं, उसे प्राथमिक समूह कहते हैं। इस प्रकार प्राथमिक समूह के सदस्यों में परस्पर घनिष्ठता होती है और वे परस्पर एक-दूसरे के सम्मुख आकर मिलते-जुलते हैं। व्यक्ति के लिए इनका अत्यधिक महत्त्व होता है, इस कारण प्रत्येक . व्यक्ति इनके प्रति बहुत निष्ठा रखता है। परिवार खेल-समूह और स्थायी पड़ोस प्राथमिक समूह के
प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रमुख विद्वानों ने प्राथमिक समूह को निम्नवत् परिभाषित किया है-

कूले (Cooley) के अनुसार-“प्राथमिक समूहों से तात्पर्य उन समूहों से है, जो आमने-सामने के संबंध एवं सहयोग द्वारा लक्षित हैं। ये अनेक दृष्टियों से प्राथमिक हैं, परंतु मुख्यतया इस कारण हैं कि ये एक व्यक्ति की सामाजिक प्रकृति और आदर्शों के बनाने में मुख्य हैं। घनिष्ठ संबंधों के फलस्वरूप वैयक्तिकताओं का एक सामान्य समग्रता में इस प्रकार घुल-मिल जाना, जिससे कम-से-कम अनेक बातों के लिए एक सदस्य का उद्देश्य सारे समूह का सामान्य जीवन और उद्देश्य हो जाता है। संभवतः इस संपूर्णता का सरलतापूर्वक वर्णन ‘हमारा समूह’ कहकर किया जा सकता है। इसमें इस प्रकार की सहानुभूति और पारस्परिक अभिज्ञान है, जिसके लिए हम सबसे अधिक स्वाभाविक अभिव्यंजना है।”
यंग (Young) के अनुसार-“इसमें घनिष्ठ (आमने-सामने के) संपर्क होते हैं और सभी व्यक्ति समरूप कार्य करते हैं। ये ऐसे केंद्र-बिंदु हैं, जहाँ से व्यक्ति का व्यक्तित्व विकसित होता है।”
कुंडबर्ग (Lundberg) के अनुसार-“प्राथमिक समूहों का तात्पर्य दो या दो से अधिक ऐसे व्यक्तियों से है, जो घनिष्ठ, सहभागी और वयैक्तिक ढंग से एक-दूसरे से व्यहार करते हैं।”
जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार-“प्राथमिक या आमने-सामने के समू, प्रत्यक्ष व्यक्तिगत संबंधों पर
आधारित होते हैं, इनमें सदस्य परस्पर तुरंत व्यवहार करते हैं।” इस परिभाषा द्वारा स्पष्ट होता है कि प्राथमिक समूह के विभिन्न सदस्यों के आपसी संबंध प्रत्यक्ष तथा व्यक्तिगत होते हैं, उनमें औपचारिकता नहीं होती।
इंकलिस (Inkeles) के अनुसार—“प्राथमिक समूहों में सदस्यों के संबंध भी प्राथमिक होते हैं, जिनमें व्यक्तियों में आमने-सामने के संबंध होते हैं तथा सहयोग और सहवास की भावनाएँ इतनी प्रबल होती हैं, कि व्यक्ति का ‘अहम’, ‘हम’ की भावना में बदल जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि इन समूहों को प्राथमिक समूह इस कारण से कहा जाता है क्योंकि इन समूहों में परस्पर घनिष्ठता, सहयोग, एकता तथा प्रेम का अत्यंत स्वाभाविक रूप से विकास होता है। ये सदस्य अपने लिए ‘हम’ शब्द का प्रयोग करते हैं तथा इनके परस्पर संबंध प्रत्यक्ष होते हैं। प्राथमिक समूह में ही व्यक्ति अपने भावी जीवन के लिए पाठ पढ़ता है। प्रेम, न्याय, उदारता तथा सहानुभूति जैसे गुणों की जानकारी व्यक्ति को प्राथमिक समूहों में ही मिलती है। कूले ने परिवार, पड़ोस एवं क्रीड़ा समूह को प्रमुख प्राथमिक समूह माना है।

प्राथमिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ

प्राथमिक समूह की विशेषताएँ दो भागों में विभाजित की जा सकती हैं-
(अ) बाह्य या भौतिक विशेषताएँ तथा
(ब) आंतरिक विशेषताएँ। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है–

(अ) बाह्य या भौतिक विशेषताएँ
⦁    भौतिक निकटता-प्राथमिक समूह के सदस्य एक-दूसरे के सम्मुख होकर मिलते-जुलते और संपर्क स्थापित करते हैं। आमने-सामने देखने और परस्पर वार्तालाप करने से विचारों का आदान-प्रदान होता है और सदस्य एक-दूसरे के निकट आते हैं। इस प्रकार की भौतिक निकटता प्राथमिक समूहों के विकास में परम सहायक होती हैं। इसी भौतिक निकटता को किंग्सले डेविस जैसे विद्वानों ने शारीरिक समीपता’ कहा है।
⦁    समूह की लघुता–प्राथमिक समूह की दूसरी विशेषता उसका लघु स्वरूप है। समूह की लघुता के कारण ही सदस्यों में घनिष्ठता का निर्माण होता है। प्राथमिक समूह के छोटे होने से सदस्यों में परस्पर मिलने-जुलने और परस्पर निकट आने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। प्राथमिक समुह के सदस्यों की संख्या कम होती है। कुले (Cooley) ने इसके सेर्दस्यों की संख्या 2 से 25 तक जबकि फेयरचाइल्ड ने 3-4 से लेकर 50-60 तक बताई है।
⦁    स्थायित्व प्राथमिक समूह अन्य समूहों की अपेक्षा अधिक स्थायी होते हैं। समूह के सदस्यों के संबंध की अवधि पर्याप्त दीर्घ होती है और इसी कारण उसमें अधिक घनिष्ठता होती है। घनिष्ठ संबंध अधिक समय तक बने रहते हैं, अत: प्राथमिक समूह अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होते हैं।

(ब) आंतरिक विशेषताएँ।
प्राथमिक समूह की आंतरिक विशेषताओं को संबंध उन प्राथमिक संबंधों से होता है, जो इन समूहों में पाए जाते हैं। इस वर्ग की मुख्य विशेषताएँ निम्नवर्णित है-

⦁    संबंधों की स्वाभाविकता—इन समूहों में संबंधों की स्थापना स्वेच्छा से होती है, बलपूर्वक | नहीं। ये संबंध स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं; उनमें कृत्रिमता नहीं होती।
⦁    संबंधों की पूर्णता-प्राथमिक समूहों में व्यक्ति पूर्णतयां भाग लेता है। इसका मूल कारण सदस्यों की परस्पर घनिष्ठता एवं एक-दूसरे के प्रति पूर्ण जानकारी है। संबंधों में पूर्णता के कारण सदस्यों में परस्पर प्रेम-भावना पर्याप्त मात्रा में विकसित हो जाती है।
⦁    वैयक्तिक संबंध–प्राथमिक समूहों के समस्त सदस्यों के परस्पर संबंध व्यक्तिगत होते हैं। वे एक-दूसरे से पूर्णतया परिचित होते हैं तथा एक-दूसरे के नाम तथा परिवार के बारे में भी पूर्ण ज्ञान रखते हैं।
⦁    उद्देश्यों में समानता–प्रत्येक प्राथमिक समूह के सदस्य एक ही स्थान पर रहते हैं अतः उनके जीवन के मुख्य उद्देश्यों में भी समानता रहती है।
⦁    हम की भावना-प्राथमिक समूह छोटे होते हैं, सदस्यों में घनिष्ठता होती है और उनके उद्देश्यों में समानता होती है अतः उनमें ‘हम की भावना का विकास हो जाता है। प्रत्येक सदस्य में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति होती है।
⦁    संबंध स्वयं साध्य होते हैं—प्राथमिक समूहों में कोई भी आदर्श या संबंध साधन के रूप में न होकर स्वयं साध्य होता है। यदि विवाह धन प्राप्ति के उद्देश्य से किया गया है तो वह विवाह न होकर अर्थ-पूर्ति का कार्य माना जाएगा। इन समूहों में संबंध किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए न होकर प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार यदि कोई मित्रता स्वार्थ पूर्ति के लिए करता है तो उसे हम मित्रता न कहकर स्वार्थपरता कहेंगे। इसी प्रकार संबंधों का कोई उद्देश्य न होकर वे स्वयं साध्य होते हैं।
⦁    सामाजिक नियंत्रण के साधन–प्राथमिक समूहों की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि ये सामाजिक नियंत्रण के प्रभावशाली साधन होते हैं। उनके द्वारा अनौपचारिक रूप से सामाजिक नियंत्रण लागू किया जाता है।

उपर्युक्त विवरण से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि प्राथमिक समूहों का हमारे जीवन में एक विशेष स्थान है। प्राथमिक समूह प्रत्येक व्यक्ति का समाजीकरण करते हैं तथा उसको मानसिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। व्यक्ति के बचपन में लालन-पालन का कार्य प्राथमिक समूह द्वारा ही होता है। व्यक्ति की अनेक भौतिक, शारीरिक एवं भावात्मक आवश्यकताएँ मुख्य रूप से प्राथमिक समूहों में ही पूरी होती हैं।

+1 vote
by (57.8k points)

प्राथमिक समूहों को प्राथमिक कहे जाने के कारण

चार्ल्स कूले ने प्राथमिक समूहों के प्रमुख रूप से तीन उदाहरण दिए हैं–परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा-समूह। इन्हें अनेक कारणों से प्राथमिक कहा जाता है, जिनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

⦁    समय की दृष्टि से प्राथमिक-प्राथमिक समूह समय की दृष्टि से प्राथमिक हैं, क्योंकि सर्वप्रथम बच्चा इन्हीं समूहों के सपंर्क में आता है।
⦁    महत्त्व की दृष्टि से प्राथमिक—प्राथमिक समूह महत्त्व की दृष्टि से प्राथमिक है, क्योंकि व्यक्तित्व के निर्माण में इनका विशेष योगदान रहता है।
⦁    मानव संघों का प्रतिनिधित्व करने में प्राथमिक–प्राथमिक समूह मौलिक मानव संघों का प्रतिनिधित्व करने की दृष्टि से भी प्राथमिक है तथा इसलिए मानव आवश्यकताओं की पूर्ति के | रूप में इनका इतिहास अति प्राचीन है।
⦁    समाजीकरण करने की दृष्टि से प्राथमिक–प्राथमिक समूह समाजीकरण की दृष्टि से प्राथमिक हैं, क्योंकि इन्हीं से बच्चे को सामाजिक परंपराओं व मान्यताओं का ज्ञान होता है।
⦁    संबंधों की प्रकृति की दृष्टि से प्राथमिक–प्राथमिक समूह संबंधों की प्रकृति के आधार पर भी प्राथमिक हैं, क्योंकि इन्हीं से व्यक्ति में सहिष्णुता, दया, प्रेम और उदारता की मनोवृत्ति जन्म लेती है।
⦁    आत्म-नियंत्रण की दृष्टि से प्राथमिक—प्राथमिक समूह आत्म-नियंत्रण कहा जाना पूर्णत: उचित है। यदि हम परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा-समूह के उदाहरण को सामने रखें तो उपर्युक्त आधार इस बात की पुष्टि करते हैं।

प्राथमिक समूहों का महत्त्व
प्राथमिक समूह अपने सदस्यों के व्यवहार को सामाजिक मान्यताओं के अनुकूल नियंत्रित करने तथा उनके व्यक्तित्व का विकास करने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनके महत्त्व को निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है—

⦁    व्यक्तित्व के विकास में सहायक प्राथमिक समूह में व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता | है। मानव की अधिकांश सीख प्राथमिक समूहों की ही देन है। यह सदस्यों के लिए व्यक्तित्व विकास का प्रमुख अभिकरण है। उदाहरणार्थ-परिवार, पड़ोस तथा क्रीड़ा-समूह तीनों प्राथमिक समूह के रूप में व्यक्तित्व के विकास में सहायक हैं।
⦁    आवश्यकताओं की पूर्ति-ये समूह व्यक्ति की सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इनका निर्माण किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता अपितु व्यक्तियों के सामान्य हितों की पूर्ति के लिए इनका निर्माण स्वतः ही होती है। ये व्यक्ति की अनेक | मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं (यथा मानसिक सुरक्षा, स्नेह आदि) की पूर्ति करते हैं।
⦁    समाजीकरण में सहायक प्राथमिक समूह व्यक्ति को समाज में रहने के योग्य बनाते हैं। इन समूहों में रहकर व्यक्ति समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों का पालन करता है और उन सबका ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है। एच०ई० बार्ल्स का कथन है कि सामाजिक प्रक्रिया के विकास में प्राथमिक समूह अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं तथा वे स्वाभाविक रूप से व्यक्ति के समाजीकरण व स्थापित संस्थाओं के एकीकरण व सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण होते हैं।
⦁    कार्यक्षमता में वृद्धि–प्राथमिक समूह में व्यक्तियों को एक-दूसरे से सहायता, प्रेरणा तथा प्रोत्साहन मिलता है, जिससे व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
⦁    सुरक्षा की भावना–प्राथमिक समूह व्यक्ति में सुरक्षा की भावना उत्पन्न करते हैं और उनमें पारस्परिक प्रेम की भावना उत्पन्न करके उनके व्यवहार को समाज के अनुकूल बना देते हैं।
⦁    सामाजिक नियंत्रण में सहायक प्राथमिक समूह सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख साधन हैं। ये समूह प्रथाओं, कानूनों एवं परंपराओं तथा रूढ़ियों के द्वारा व्यक्तियों के सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।
⦁    नैतिक गुणों का विकास–प्राथमिक समूह व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करते हैं, क्योंकि इन समूहों में रहकर व्यक्ति सदाचार, सहानुभूति एवं सहिष्णुता आदि गुणों को सीख जाता है। लैंडिस (Landis) ने इसके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि प्राथमिक समूहों में व्यक्ति में सहिष्णुता, दया, प्रेम और उदारता की मनोवृत्ति जन्म लेती है।
⦁    संस्कृति के हस्तांतरण में सहायक प्राथमिक समूह संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांरित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनसे सामाजिक विरासत की रक्षा ही नहीं होती अपितु हस्तांतरण द्वारा इसमें निरंतरता भी बनी रहती है।

उपर्युक्त विवेचन से प्राथमिक समूहों का महत्त्व स्पष्ट होता है। वास्तव में प्राथमिक समूह जीवन के प्रत्येक पक्ष से संबंधित है तथा व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करने तथा दिशा निर्देश देने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस संदर्भ में कूले ने ठीक ही कहा है कि “प्राथमिक समूहों द्वारा पाशविक प्रेरणाओं का मानवीकरण किया जाना ही संभवतः इनके द्वारा की जाने वाली प्रमुख सेवा है।”

Related questions

Welcome to Sarthaks eConnect: A unique platform where students can interact with teachers/experts/students to get solutions to their queries. Students (upto class 10+2) preparing for All Government Exams, CBSE Board Exam, ICSE Board Exam, State Board Exam, JEE (Mains+Advance) and NEET can ask questions from any subject and get quick answers by subject teachers/ experts/mentors/students.

Categories

...