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सामाजिक नियंत्रण की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।

या

सामाजिक नियंत्रण से आप क्या समझते हैं। सामाजिक नियंत्रण की आवश्यकता एवं कार्यों का उल्लेख कीजिए।

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मनुष्य की प्रकृति पूर्णतया निर्मल नहीं होती है। उसमें मुख्यत: सद् या असद् दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ पाई जाती है। सद् प्रवृत्तियों को सामाजिक तथा असद् प्रवृत्तियों को असामाजिक प्रवृत्तियाँ कहा जाता है। समाज के कल्याण और अस्तित्व के लिए आवश्यक है कि असद् की अपेक्षा सद् प्रवृत्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि असद् तथा असामाजिक प्रवृत्तियों पर अधिक-से-अधिक नियंत्रण रखा जाए। मानव-सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य असद् प्रवृत्तियों पर किसी-न-किसी प्रकार के नियंत्रण का प्रयास करता रहा है। इस नियंत्रण के परिणामस्वरूप ही सद् प्रवृत्तियों का विकास होता रहा है और मनुष्य समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार करता रहता है। सामाजिक नियंत्रण समाजशास्त्र में सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली संकल्पनाओं में से एक है। इसका कारण यह है कि कोई भी समाज बिना नियंत्रण के अपना अस्तित्व अधिक देर तक नहीं बनाए रख सकता है। मनुष्य को मनचाहा व्यवहार करने से रोकने तथा समाज को व्यवस्थित रखने में सामाजिक नियंत्रण का विशेष योगदान होता है।

सामाजिक नियंत्रण का अर्थ एवं परिभाषाएँ
सामान्य शब्दों में प्रत्येक व्यक्ति को समाज द्वारा मान्य आदर्शों व प्रतिमानों के अनुसार अपने को ढालना पड़ता है तथा उसी के अनुसार वह व्यवहार और आचरण करने के लिए बाध्य होता है। यह बाध्यता ही सामाजिक नियंत्रण कहलाती है। यह वह विधि है, जिसके द्वारा एक समाज अपने सदस्यों एवं समूहों के व्यवहार का नियमन करता है तथा उदंड या उपद्रवी सदस्यों को पुनः राह पर लाने का प्रयास करता है। सामाजिक नियंत्रण की परिभाषाओं से इसके अर्थ को और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं-

गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार-“सामाजिक नियंत्रण सुझाव, अनुनय, प्रतिरोध और प्रत्येक प्रकार के बल प्रयोग; जिसमें शारीरिक बल भी सम्मिलित हैं; जैसे उपायों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा समाज अपने अंतर्गत उपसमूहों व सदस्यों को स्वीकृत आदर्शों के माने हुए प्रतिमानों के अनुसार ढाल लेता है।”
मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-“सामाजिक नियंत्रण से आशय उस ढंग से है, जिसमें कि समस्त सामाजिक व्यवस्था समन्वित रहती है और अपने को बनाए रखती है अथवा वह जिसमें संपूर्ण व्यवस्था एक परिवर्तनशील संतुलन के रूप में क्रियाशील रहती है।”
ब्रियरली (Brearly) के अनुसार-“सामाजिक नियंत्रण नियोजित या अनियोजित उन प्रक्रियाओं एवं साधनों के लिए सामूहिक शब्द है, जिसके द्वारा व्यक्तियों को सिखाया जाता है, आग्रह किया जाता है। या बाध्य किया जाता है कि वे उन समूहों की रीतियों और जीवन के मूल्यों का पालन करें जिनके कि वे सदस्य हैं।”
स्मिथ (Smith) के अनुसार-“सामाजिक नियंत्रण उन उद्देश्यों की पूर्ति है जो कि उन उद्देश्यों के प्रति जागरूक सामूहिक अनुकूलन द्वारा होती है।” ऑगबर्न एवं
निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-“एक समाज व्यवस्था और स्थापित नियमों के बनाए रखने के लिए जिस दबाव के प्रतिमान को प्रयोग करता है, वह उसकी सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था कहलाती है।”
बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार–“समूह नियंत्रण वह पद्धति है, जिसके द्वारा समूह अपने सदस्यों के व्यवहारों को नियंत्रित करता है।
रॉस (Ross) के अनुसार-“सामाजिक नियंत्रण का तात्पर्य उन सभी शक्तियों से है, जिनके द्वारा समुदाय व्यक्ति को अपने अनुरूप बनाता है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि सामाजिक नियंत्रण उन साधनों, प्रक्रियाओं के व्यवस्थाओं की समग्रता को कहते हैं जिससे समाज में संतुलन बना रहता है, व्यक्तियों को सामाजिक मान्यताओं एवं नियमों के अनुरूप व्यवहार करने के लिए बाध्य होना पड़ता है और सामाजिक जीवन सुचारू रूप से चलता रहता है।

सामाजिक नियंत्रण का महत्त्व तथा आवश्यकता
सामाजिक नियंत्रण का अनेक दृष्टिकोणों से महत्त्व है। इसकी आवश्यकता और महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

⦁    सहयोग का जन्मदाता–समाज के विकास और कल्याण के लिए सहयोग का विशेष महत्त्व है। समाज में सहयोग की स्थापना में सामाजिक नियंत्रण की विशेष भूमिका है। सामाजिक नियंत्रण के कारण यदि कभी सहयोग इच्छा से प्राप्त होता है तो कभी बलपूर्वक। दोनों प्रकार के सहयोग से समाज को लाभ होता है।
⦁    सामाजिक संगठन में स्थायित्व-सामाजिक नियंत्रण द्वारा समाज में स्थायित्व बना रहता है। प्रत्येक व्यक्ति इस भय से सामाजिक नियमों की अवहेलना नहीं करता, क्योंकि उसे भय रहता है कि कहीं उसे दंडित न किया जाए। इस प्रकार वह सामाजिक नियमों के अनुसार कार्य भी करता है, जिससे सामाजिक संगठन में स्थिरता बनी रहती है।
⦁    प्राचीन सामाजिक व्यवस्था की पुनस्र्थापना में सहायक–सामाजिक नियंत्रण का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके द्वारा प्राचीनकाल से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में सहायता मिलती है। सामाजिक नियंत्रण द्वारा पूर्वजों की अपनाई गई परंपराओं तथा रीति-रिवाजों को उनकी संतानें भी मानने के लिए बाध्य होती है।
⦁    समाजीकरण में सहायक-सामाजिक नियंत्रण व्यक्ति के समाजीकरण में सहायक होता है। सामाजिक नियंत्रण से व्यक्ति को अपने ऊपर एक सत्ता का अनुभव होता है अत: वह समाज के अनुकूल ही अपने आचरण को ढालने तथा समाज द्वारा स्वीकृत मान्यताओं के अनुकूल व्यवहार करने का प्रयास करता है। इससे व्यक्ति का व्यवहार समाजीकृत हो जाता है।
⦁    समाज में एकरूपता लाने में सहायक-सामाजिक नियंत्रण द्वारा समाज के स्वरूप में एकरूपता उत्पन्न होती है। इसके द्वारा समाज के सदस्यों के व्यवहार नियंत्रित होते हैं और सबको समान रूप से सामाजिक नियमों का पालन केरना पड़ता है। इस कारण समाज में एकता पाई जाती है।
⦁    सामाजिक संघर्ष को दूर करने में सहायक–टी०बी० बॉटोमोर (T.B. Bottomore) के शब्दों में, “सामाजिक नियंत्रण के पद का अभिप्राय मूल्यों और आदर्शों के उस समूह से है, जिसके द्वारा व्यक्तियों और समूहों के मध्य तनावों और संघर्षों को दूर अथवा कम किया जाता जिससे कि किसी अधिक समावेश समूह की सुदृढ़ता बनाए रखी जा सके। इस प्रकार | सामाजिक नियंत्रण समाज में उत्पन्न होने वाले संघर्ष को टालने में सहायक होता है।
⦁    परंपराओं की सुरक्षा-परंपराएँ सामाजिक नियंत्रण का एक अंग होती हैं। इस कारण कोई भी व्यक्ति उन्हें भंग करने का साहस नहीं करता। सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन परंपराओं की रक्षा के लिए विशेष रूप से सहायक हैं।
⦁    संस्कृति की सुरक्षा-परंपराएँ, रुढ़ियाँ, संस्थाएँ आदि संस्कृति के अंतर्गत ही आती हैं। इनके द्वारा सामाजिक नियंत्रण होता है। कोई भी व्यक्ति सामाजिक नियंत्रण के भय से उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं करता। इससे संस्कृति की सुरक्षा होती है।
⦁    सामाजिक सुरक्षा-व्यक्ति की संपत्ति आदि की सुरक्षा सामाजिक नियंत्रण द्वारा ही संभव है। सामाजिक नियंत्रण के साथ राज्य की शक्ति जुड़ी होती है। इसीलिए कोई भी व्यक्ति किसी अन्य की संपत्ति का हरण, दंड के भय से नहीं करता।

सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख कार्य
सामाजिक नियंत्रण के महत्त्व तथा आवश्यकताओं से इसके कार्यों का भी पता चलता है। इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करना सामाजिक नियंत्रण का कार्य है। संक्षेप में, सामाजिक नियंत्रण के निम्नांकित प्रमख कार्य हैं-

⦁    सामाजिक संतुलन एवं सुव्यवस्था को बनाए रखना इसका सर्वप्रमुख कार्य है। इसके अभाव में न तो संतुलन और न ही व्यवस्था बनी रह सकती है।
⦁    सामाजिक नियंत्रण का दूसरा कार्य व्यक्तियों को आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करने की प्रेरणा देकर उनमें सामाजिक समानता लाना तथा उसे बनाए रखना है।
⦁    सामाजिक नियंत्रण को तीसरा प्रमुख कार्य व्यक्तियों व सामाजिक समूहों को समाज में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर उदेश्यों को पूरा करने में सहायता प्रदान करना है।
⦁    इसका चौथा कार्य समाज द्वारा स्वीकृत आदर्शों व मूल्यों की रक्षा करना है। यदि व्यवहार में सर्वमान्य आदर्श व मूल्य समाप्त हो जाएँगे तो सामाजिक व्यवस्था तृप हो जाएगी।
⦁    सामाजिक नियंत्रण का पाँचवाँ- प्रमुख कार्य सामाजिक विरासत को बनाए रखना है। इसके द्वारा पुरातन रूढ़ियों, प्रथाओं, परम्पराओं और रीति-रिवाजों की रक्षा होती है।
⦁    सामाजिक नियंत्रण मानवीय व्यवहार को नियंत्रित व निर्देशित करता है। इसके अभाव में व्यक्तियों का व्यवहार मनमाना हो जाता है।
⦁    सामाजिक नियंत्रण का एक अन्य कार्य समाजीकरण की प्रक्रिया में सहायता देना है। समाजीकरण में पुरस्कार व दंड का विशेष महत्त्व है। जो व्यक्ति फिर भी सामाजिक मान्यताओं के अनुकूल व्यवहार न करें, वे सामाजिक नियंत्रण के कठोर साधनों द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य किए जाते हैं।
⦁    सामाजिक नियंत्रण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य सामाजिक संगठन को निरंतर बनाए रखना

उपर्युक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक नियंत्रण समाज में सामाजिक व्यवस्था तथा इसकी निरंतरता बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। सम्भवतः इसीलिए यह संसार के प्रत्येक देश में किसी-न-किसी रूप में पाया जाता है। यदि समाज सामाजिक नियंत्रण द्वारा व्यक्तियों के मनचाहे व्यवहार पर नियंत्रण में रखे तो समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी और इसका अस्तित्वे व निरंतरता खतरे में पड़ जाएगी।

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