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in पीयूष प्रवाह - सत्य के प्रयोग (आत्मकथा अंश) by (52.8k points)
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“मैं जंगली नहीं रहूँगा, सभ्य के लक्षण ग्रहण करूंगा।” गाँधीजी ने सभ्य बनने के लिए क्या किया?

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मित्रे गाँधीजी को जंगली न समझे इसके लिए गाँधी ने अपने जीवन में परिवर्तन करने का निश्चय किया। उन्होंने सबसे पहले अपनी पोशाक बदली। आर्मी और नेवी स्टोर में कपड़े सिलवाये। इतना ही नहीं बॉण्ड स्ट्रीट में पोशाक सिलवाई। चिमनी टोपी सिर पर पहनी। दोनों जेबों में लटकने वाली सोने की बढ़िया चैन मँगवाई। बँधी-बँधाई टाई पहनना शिष्टाचार के विरुद्ध था। इस कारण टाई बाँधना सीखा। बालों को ठीक रखने का प्रयत्न किया। बालों में पट्टी डालकर सीधी माँग निकालने में समय बर्बाद किया। बालों को मुड़ा रखने के लिए ब्रश का प्रयोग किया। माँग को सँवारने के लिए हर समय सिर पर हाथ फेरते रहते । सभ्य बनने के लिए केवल पोशाक ही पर्याप्त नहीं थी। अत: नाचना सीखा। फ्रेंच भाषा सीखी। भाषण कला सीखी। वायलिन सीखने का विचार भी बनाया। इस तरह गाँधीजी ने मित्र के सामने जंगली न रहकर सभ्य बनने का प्रयास किया।

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