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मोहन राकेश द्वारा लिखित ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाट्य लेखन के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।

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मोहन राकेश द्वारा रचित ‘आषाढ़ का एक दिन’ शीर्षक नाटक हिंदी नाटक और रंगमंच के इतिहास में एक विलक्षण स्थान रखता है। वे पहले नाटककार हैं जिन्होंने नाटक और रंगमंच का परस्पर रिश्ता जोड़ा। उन्होंने रंगमंच के अनुसार नाट्य-लेखन को महत्त्व दिया। प्रस्तुत नाटक इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है क्योंकि देश के विभिन्न मंचों पर इसका सफल मंचन हुआ है।

मोहन राकेश के नाटकों को पढ़कर और उनका मंचन देखकर स्पष्ट हो जाता है कि वे कथातंत्र और नाट्य विधा दोनों पर समान अधिकार रखते हैं। दोनों विधाओं पर उनकी गहरी पकड़ है। वे कहीं भी कथात्मकता के चक्कर में नाट्य विधा की पीछे नहीं छोड़ते। उन्होंने दोनों का समान निर्वाह किया है। वास्तव में मोहन राकेश को अपने संक्षिप्त जीवनकाल में जो ख्याति प्राप्त हुई, उसका कारण उनके नाटक ही थे- जिसके कारण वे एक युगान्तकारी नाटककार सिद्ध हुए। सम्भवतः ऐसा सौभाग्य अन्य नाटककारों को प्राप्त नहीं हो सका। इनके नाटकों से कथा साहित्य में एक नवीनता के दर्शन हुए और हिन्दी रंगमंच के विकास में भारी सहायता मिली।

मोहन राकेश के नाटकों को ख्याति इसलिए भी प्राप्त हुई कि वे अपने नाटकों के मंचन से सम्बन्धित सभी बातों का विवरण देते थे। यह बात उनकी डायरी के पन्नों से स्पष्ट होती है। इन बातों से रचना-धर्मिता के प्रति उनकी समर्पण भावना का पता चलता है।

प्रस्तुत नाटक मोहन राकेश का एक ऐसा नाटक है जिसमें इतिहास को आधार बनाकर समकालीन समस्याओं की ओर प्रबल व प्रभावपूर्ण ढंग से संकेत किया गया है। हिंदी नाट्य-लेखन के क्षेत्र में यह एक ऐतिहासिक कृति है। इसमें मूल रूप से कालिदास के जीवन को आधार में लेकर साहित्य-सृजन, सृजन की स्वतंत्रता, सर्जक के स्वाभिमान और राज्याश्रय की समस्या पर विचार किया गया है। नाटक की एक और बड़ी समस्या नर-नारी संबंधों अर्थात् प्रेम-भावना को लेकर चलती है।

प्रस्तुत नाटक का नामकरण छायावादी प्रतीत होता है। वास्तव में यह नाटक भावनाओं के वरण और राज्याश्रय के कारण कुंठित स्वाभिमान के बीच मंचित होता है। नाटककार ने नाटक के प्रारंभ में भी आषाढ़ के दिन बरसते मेघों की चर्चा की है और अंत भी इसी नैसर्गिक परिवेश में होता है। नाटककार ने इसी को संकेतित करने के लिए बरसते मेघों, कड़कती चमकती बिजली आदि की योजना को प्रस्तुत किया है।

वास्तव में नाटक के मूल में जिस भावनात्मक परिवेश की आवश्यकता थी, उसे प्राकृतिक संसर्ग द्वारा ही दिखाया जा सकता था। इसलिए आषाढ़ का बरसता दिन और उसमें भीगती हुई मल्लिका को दिखाना एक सार्थक तथा उपयुक्त प्रयास है। रोमांटिकता का बोध नाटक को एक सटीक आधार दे जाता है।

नाटककार मोहन राकेश ने दिखाया है कि आषाढ़ की पहली वर्षा मल्लिका के लिए- कुछ हद तक कालिदास के लिए भी, जिस आनन्द का सन्देश लेकर आई थी, वही और उसी प्रकार की वर्षा, बादलों की गरज और बिजली की चमक उन दोनों के हर्षोल्लास को सदा सदा के लिए छीनकर, जीवन के यथार्थ का कटु आभास देकर समाप्त हो जाती है। नाटक का यह वातावरण प्रेम-भावना को सजग एवं सजीव बनाने में विशेष रूप से सहायक हुआ है।

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