Fewpal
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निम्नलिखित अवतरण को पढ़कर, अन्त में दिये गये प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर लिखिए :

महाभारत का युद्ध जारी था। भीष्म और द्रोणाचार्य का वध हो चुका था और सेनाध्यक्ष पद की बागडोर दुर्योधन ने कर्ण को सौंपी थी। उसके रणकौशल के सामने पाण्डव-सेना के छक्के छूटने लगे। स्वयं अर्जुन भी हतोत्साहित हो गया था, किन्तु कर्ण का दुर्भाग्य कहिए या परशुराम का श्राप, कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में फंस गया। यह देख कर्ण तत्काल रथ से कूदा और उसे निकालने की कोशिश करने लगा।

श्रीकृष्ण ने कर्ण की यह स्थिति देख अर्जुन को उस पर बाणवर्षा जारी करने का इशारा किया। अर्जुन ने उनके निर्देशों का पालन किया, जिससे कर्ण बाणों के आघात को सहन न कर सका। वह अर्जुन से बोला, “महाधनुर्धर, थोड़ी देर रुक जाओ। क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता कि मेरा ध्यान रथ का पहिया निकालने में जुटा हुआ है? क्या तुम नहीं जानते कि जो योद्धा रथविहीन हो, जिसके शस्त्र नष्ट हो गये हों, या जो निहत्था हो, युद्ध रोकने की प्रार्थना कर रहा हो, ऐसे योद्धा पर धर्मयुद्ध के ज्ञाता और शूरवीर शस्त्र प्रहार नहीं करते? इसलिये महाबाहो! जब तक मैं इस पहिये को न निकाल लूँ, मुझ पर प्रहार न करो, क्योंकि यह धर्म के अनुकूल नहीं होगा।”

कर्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह उपदेश श्रीकृष्ण को शूल की तरह चुभा। वे कर्ण से बोले, “बड़े आश्चर्य की बात है कि आज धर्म याद आ रहा है। सच है कि जब नीच मनुष्य विपत्ति में पड़ता है, तो उसे अपने कुकर्मों की याद तो नहीं आती, मगर दूसरों को धर्मोपदेश देने का विचार अवश्य आता है। उचित होता, तुमने अपने धूर्त कर्मों और पापों का विचार किया होता। हे महावीर कर्ण! जब दुर्योधन के साथ मिलकर तुमने पाण्डवों के लिए लाक्षागृह बनवाया, भीम को खत्म करने के इरादे से विष दिलवाया, तेरह वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद भी पाण्डवों को राज्य नहीं दिया, द्रौपदी का चीरहरण करवाया, निहत्थे अभिमन्यु को तुम्हारे समेत सात महारथियों ने मारा, तब तुम्हारा धर्मज्ञान कहाँ गया था? क्या तुम्हें तब धर्मपालन की विस्मृति हो गयी थी।”

कर्ण को इसका उत्तर देते न बना। वह अर्जुन की बाणवर्षा के सामने टिक न सका और धराशायी हो गया।

(a) भीष्म और द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद दुर्योधन ने सेनाध्यक्ष की बागडोर किसे सौंपी और क्यों?

(b) युद्ध के मैदान में कर्ण के साथ क्या घटना घटित हुई? 

(c) लगातार बाणवर्षा के आघात को सहन न कर सकने पर कर्ण ने अर्जुन को रोकते हुए क्या कहा?

(d) कर्ण की उपदेश भरी बातों को सुनकर श्रीकृष्ण ने क्या जवाब दिया?
 

(e) प्रस्तुत गद्यांश को पढ़कर आपको क्या शिक्षा मिलती है? समझाकर लिखिए।

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(a) भीष्म और द्रोणाचार्य की मृत्यु के पश्चात् दुर्योधन ने कर्ण को अपना सेनाध्यक्ष बनाया क्योंकि वह एक शूरवीर योद्धा था। उसके रणकौशल के सामने पाण्डव सेना का टिक पाना असम्भव था। यहाँ तक कि अर्जुन भी कर्ण के सामने घबरा जाता था। कर्ण की वीरता पर दुर्योधन को विश्वास था।

(b) युद्ध के मैदान में दुर्भाग्यवश कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में धंस गया। कर्ण ने तत्काल रथ से उतर कर उसे निकालने की कोशिश की, परन्तु वह उसे निकालने में असमर्थ रहा। उधर श्रीकृष्ण ने मौके का फायदा उठाकर अर्जुन से कर्ण पर लगातार बाणवर्षा करने को कहा। अर्जुन ने भी कृष्ण का कहना मानते हुए लगातार कर्ण पर बाणवर्षा जारी रखी।

(c) लगातार बाणवर्षा के आघात को सहन न कर सकने पर कर्ण ने अर्जुन को रोकते हुए कहा- महाधनुर्धर तुम कुछ समय के लिए वार करना बन्द कर दो क्योंकि तुम देख रहे हो कि मैं अपने रथ का पहिया निकालने में व्यस्त हूँ और तुम युद्ध के नियम जानते हो कि युद्ध में यदि योद्धा रथविहीन हो या किसी योद्धा के ‘शस्त्र’ नष्ट हो गए हों या वह निहत्था हो और युद्ध को रोकने की प्रार्थना कर रहा हो तो ऐसे योद्धा पर धर्म युद्ध के ज्ञाता और वीर पुरुष वार नहीं करते। इसलिए जब तक मैं रथ का पहिया बाहर न निकाल लूँ तब तक तुम मुझ पर तीर मत चलाओ क्योंकि धर्म के अनुसार यह उचित नहीं होगा।

(d) कर्ण की उपदेश भरी बातों को सुनकर श्रीकृष्ण ने जवाब देते हुए कहा कि अब तुम्हें धर्म की बातें याद आ रही हैं जब तुम विपत्ति में पड़े हो, तब तुम्हारा धर्म कहाँ था जब तुमने दुर्योधन के साथ मिलकर लाक्षागृह बनवाया था। पाण्डवों को जिन्दा जलाने के लिए तथा भीम को विष देकर मारने का प्रयास किया। तेरह वर्ष समाप्त होने पर भी पाण्डवों का राज्य वापस नहीं किया। द्रौपदी का चीरहरण करवाया और इतना ही नहीं तुम्हारे समेत सात महारथियों ने मिलकर अकेले अभिमन्यु को घेरकर मार डाला तब तुम्हारा धर्मज्ञान कहाँ गया था। उस समय तुम्हें धर्मपालन की याद नहीं आई।

(e) प्रस्तुत गद्यांश को पढ़कर हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा धर्मज्ञान अर्थात् नियमों को याद रखना चाहिए। विपत्ति के समय, स्वार्थवश नियमों या धर्म को याद करना नीचता है। वह इंसान नीच ही होता है जो बारी आने पर धर्म की बात करता है। दूसरों के मौके पर धर्म को याद करता है। घमण्ड में चूर रहकर दूसरों को नुकसान पहुंचाता है जैसा कि कर्ण का व्यवहार था।

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